Posted in Hindi poetry

बचपन

कहीं गुम हो गई वो मासुमियत
खो गई कहीं वो प्यारी मुसकान
इस असंतोषी भागमभाग भारी ज़िन्दगी में
यादें उन बीते दिनों की
यादें उन गुजरे पलों की
याद आती है फिर
बचपन की वो हँसी फुलवारी
थोड़ा कच्चापन, थोड़ी नादानी
वो हर समय की खेल-कूद
वो हर पल शैतानी
नहीं जानते क्या सही या गलत
नहीं जानते छल-कपट
वो तोतली आवाज़ में बातें
वो हर पल दिमाग में चलती नई खुराफाती
वो हर दिन की नई जिज्ञासा
नए नए प्रश्नों के साथ हाजिर
वो छोटी छोटी लड़ाई दो पल की
फिर मनाना दो पल का
पर ये विडंबना आज की
कि छिन गया है बचपन बच्चो का
अब हाथ में खिलौने या किताबें नहीं
औजार है
नन्हे नन्हें बच्चें पालक है परिवार के
बच्चे काम पर जा रहे है
खो रहा है बचपन
खो रहा है बचपन ।
© ईरा सिंह

ये कविता मैंने कॉलेज में कविता लेखन प्रतियोगिता के लिए लिखी थी। आपको कैसी लगी ?

Thank you so much for reading ……

Author:

I am Doctor by profession who loves to write poetry and articles , a mental health enthusiastic , nature lover and very much interested in history and mythology .

85 thoughts on “बचपन

  1. बचपन की वो हँसी फुलवारी
    थोड़ा कच्चापन, थोड़ी नादानी
    वो हर समय की खेल-कूद
    वो हर पल शैतानी
    नहीं जानते क्या सही या गलत
    नहीं जानते छल-कपट
    वो तोतली आवाज़ में बातें

    बहुत बहुत बहुत बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ है🙏🙏😊😊😊

    Liked by 2 people

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