Posted in Hindi poetry, POETRY

तुम ऐसी क्यों हो?

इतनी हिम्मत तुम लाती कहाँ से हो
इतना तुम क्यों सहती हो
बार बार गिर कर
फिर कैसे खड़ी हो जाती हो
क्या तुम्हारा मन नहीं सहमता
क्या तुम्हें डर नहीं लगता
फिर से गिर जाने का
फिर से ठोकर खाने का
आखिर तुम ऐसी क्यों हो
कभी एकदम शांत
कभी एकदम तूफान
पल में रो देती हो
पल में हसं देती हो
बड़ी बड़ी चुनौती में भी हार नहीं मानती
और एक छोटी-सी बात पर चीड़ जाती हो
हमेशा कहाँ खोई रहती हो
क्या सोचती हो, क्या कोई खुहाब है
किसी से कुछ बोलती भी नहीं हो
कितना कुछ सबसे छुपा कर रखती हो
ऐसा क्यों है, कहती क्यों नहीं हो
क्या झूठी सहानुभूति से डरती हो
या और सवालो से
सबको माफ कैसे कर देती हो
और फिर उनकी मदद भी
तुम कभी मुझे समझ मे क्यों नहीं आती
हर चीज़ को देखने का अलग नजरिया
हमेशा निराशा में भी कोई आशा की किरण
कैसे खोज लेती हो
जितना तुम्हें जानो
तुम पहेली की तरह और उलझ जाती हो
और हमेशा चहरे पर वो मुश्कान कैसे रहती है
क्या सच में खुश हो
या सिर्फ ये एक छल है
इतना जान कर भी तुम्हें
हम नहीं जानते
और शायद जान भी ना पाए ।
© ईरा सिंह

Thanks for reading!!!

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Author:

I am Doctor by profession who loves to write poetry and articles , a mental health enthusiastic , nature lover and very much interested in history and mythology .

51 thoughts on “तुम ऐसी क्यों हो?

  1. आज बहुत दिनों बाद वर्डप्रैस पर आया,
    आपकी कविता नजर आई,
    उसे पढा।
    क्या खूबसूरती से लिखा आपने।
    मैं नही जानता इसे कितना समझ पाया, मगर आपकी कविता पढ़ आज मेरी एक कविता बन गई। प्रस्तुत है——-
    जितना समझा,
    कम रहा,
    बस इन्हीं बातों का उम्रभर गम रहा,
    न जाने कितने तूफान आए,
    न जाने कितने पर्वत
    राहों में
    चक्रवात आए,
    मगर
    मैं
    सदैव आगे बढ़ता रहा,
    तेरे हौसले,जिद्द में
    पल-पल
    निखरता रहा,
    सबकुछ लुटा दी,
    मेरे एक मुस्कान पर,
    कितना समझाया तूने
    हर गलत बात पर,
    मैं हर बार मझधार में फँसता और निकलता रहा,
    सवाल कैसा भी हो
    उलझता
    मगर उसे हल करता रहा,
    सफल समझा सबने हमें
    मगर मैं आज भी
    स्वयं को
    अनुतीर्ण समझता रहा,
    क्योंकि
    जो अर्जित किया वो
    ज्ञान,सम्मान
    धन-वैभव ,
    ताकत,
    सब मिलकर भी
    नही कर पाए रंगीन वो पन्ने जवाबों से
    जहाँ खड़ी थी पहेली बन
    माँ और जिंदगी,
    बहुत की तपस्या
    बहुत की ईश्वर की बंदगी,बहुत की ईश्वर की बंदगी।
    !!!मधुसूदन!!!

    Liked by 5 people

    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद , Sir 🙂🙂

      जो अर्जित किया वो
      ज्ञान,सम्मान
      धन-वैभव ,
      ताकत,
      सब मिलकर भी
      नही कर पाए रंगीन वो पन्ने जवाबों से
      जहाँ खड़ी थी पहेली बन
      माँ और जिंदगी …….ये पंक्तियाँ पूरी कविता का सार है , बहुत बहुत खूबसूरत।

      Liked by 3 people

      1. Hi Kripaa!! Hahaha it’s sort of a nick name that I came up with for her long back, she came up with ‘mystic ink slinger’ for me and I came up with ‘miss wordsmith’ for her because I love her work so much.
        She was also one of my very first followers and we became friends so the names stuck!!

        Liked by 2 people

  2. Superbbbb🙏
    Behad Umda likhe ho
    तुम कभी मुझे समझ मे क्यों नहीं आती
    हर चीज़ को देखने का अलग नजरिया
    हमेशा निराशा में भी कोई आशा की किरण
    कैसे खोज लेती हो
    जितना तुम्हें जानो
    तुम पहेली की तरह और उलझ जाती हो
    और हमेशा चहरे पर वो मुश्कान कैसे रहती है
    Love this line very very much💕🤗

    Liked by 3 people

      1. Oh, definitely Shagun, I am sorry for not being that frequent, my studies nowadays 😅😅, I missed your writing
        Thanks and same to you 🧡

        Liked by 1 person

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