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एक फूल …..

एक फूल जब है खिलता 
कितना शीतल इतना कोमल
सबको अपनी मनमोहक सुगंध से
प्रसन्नचित्त वो करता
हँसता खेलता मनमर्जियाँ करता
पौधा गर्व से सिर उठाता
ये फूल है मेरा, अभिमान वो करता
पूरा बगीचा खिल उठाता
नाचता-गाता, संगीत की महफिल होती
फिर अचानक एक दिन
सब शांत, मातम-सा छा जाता
माली फूल ले गया
सब बस बेबसी में देखते रह गए
पहले तो उस फूल को खूब सजाया गया
महंगें दाम में बेचा गया
पर जब उसकी सुगंध ख़त्म हो गई
उसे फेक दिया
और वो कोमल पुष्प
कुचल कुचल कर मर गया ।
© ईरा सिंह

आपको मेरी ये कविता कैसी लगी मुझे कमेंट में जरूर बताना । और क्या आपको समझ में आया की यहां मैंने फूल किसको कहा है ? इसको पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

Thank you!!!

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Note: if you want to translate it, Google translator is available on my website page 😊

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माफी ……

मानव जीवन का उद्देश्य था 
मानवता का विस्तार
आज वही मानव बन बैठा है
अपने जीवन में खुद अभिशाप
पाप हो या पुण्य
सही हो या गलत
क्या करना है सिर्फ उसे
अपना ही उद्धार
पर किस कीमत पर
थोड़ा तो गौर फर्मा
मिलता है मनुष्य जीवन
कई जन्मों में सिर्फ एक बार
क्या ऐसे ही मिटा दे इसे
कर रोज़ युद्ध विहार
मानव जब मानव का ही विरोधी है
तो वह जन-जीवन से क्या प्रेम करेगा
वह अपने अहम में
सिर्फ सृष्टि का ही अंत करेगा
जिसको सर्वश्रेष्ठ संरचना कहा गया ईश्वर की
अब कर रहा है सबका वो ही संहार
क्या मनुष्यता ख़त्म हो गयी
क्या सिद्ध हो गयी मानव की श्रेष्ठता
कर जन धन मन पर वार
समय है रुक जा
सत्य मार्ग पर फिर पग बढ़ा
आपने विनाश को रोक जरा
थोड़ा थम जा
थोड़ा तो फिर सोच
अपने अभिमान में
जो है उसको तो मत गावा
धरती का ह्रदय विशाल है
तू भी उसकी ही संतान है
शायद माफी मिल जाए ।
© ईरा सिंह

Thank you for reading it!!!!

Note: This poem is written in the Hindi language, you can translate and read it by using the translator option available on my website page😊

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चाह

“मैं बंद पिंजरे में बैठा
हमेशा यही सोचता
क्या जीवन है मेरा
इतनी जंजीरो से बंधा
कैसी होगी वो बाहर की दुनिया
दिनभर बस यही सोचता
मेरे सपने कब होंगे पूरे
कब मैं बाहर आ पाऊंगा
कुछ डर जाता,सहम जाता
जब कोई रास्ता नजर ना आता
पर फिर भी उड़ाने की चाह मैं रखता । “
© ईरा सिंह

मैंने यह कविता बहुत पहले मन में आने वाले अनेकों सवालो के संधर्ब में लिखी थी । कैसे हम आपने सपनो को पूरा करने के लिए हमेशा मेहनत करते है कभी कभी कुछ सपने पूरे होते है कुछ नही पर हमे कभी भी उम्मीद नही छोड़नी चाहिए

मैनें इस कविता को मेरे लेख क्या कोरोना भगवान का प्रकोप है या मानव उत्तपन आपदा ? में भी प्रयोग किया था परंतु वहां उसका संधर्ब बिल्कुल अलग था ।

मुझे लगा कि ये कविता एक नई पोस्ट में शेयर करनी चाहिए। आशा करती हूं आपको पसंद आई होगी ।

Thank you for reading it !!!!!!!

Stay safe , Stay healthy!!!!!

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ज़िन्दगी इतनी भी बुरी नहीं है

कभी सोचा है तुमने

ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है

देखोगे बैठ कर थोड़ा

खुशियाँ अनेकों अभी -भी मिल जाऐगी

हमेशा विषाद जरूरी नही

क्या परिवार का साथ

वो बैठ कर घंटों बात

एक दूसरे को जानने का एक नया अंदाज़

फिर से वो तुम्हरा छत्तो पर आ जाना

वो फिर पतंग उड़ाना

कभी खुद से तो कभी वो प्रकृति के साथ गुफ्तगू

फिर से पुराने शौक का नया आगाज़

और आजकल सब बन गए है हलवाई

क्यों इन छोटी – छोटी खुशियों से

तुम्हारा मन नही हर्षाता

हर बात पर रोना जरूरी नही

खाने को दो वक्त की रोटी है

सिर पर छत्त है

वेतन कम सही

पर मिल तो रहा है

उनसे पूछो जिनके पास इतना भी नहीं है

क्या कुछ ना होने से कुछ होना अच्छा नहीं है

रोने के हजारों बहाने मिल जायेंगे

खुश होने का एक ही काफी है

परिशनियाँ है माना

पर क्या दुखी होने से

वो हल हो जाएगी

तो क्यों ना थोड़ा मुस्कुराया जाए
अब तुम हँसते हुए जियो या रोते हुए

ये तुम्हारे ऊपर है

पर एक बार बैठ कर सोचना जरूर

ज़िन्दगी इतनी भी बुरी नही है ।

©ईरा सिंह

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पछतावा

सूरज की किरणें ड़ूब गई

अंधेरा फिर छाया

साथ में काली अंधेरी रात भी लाया

मन सहम गया , कुछ घबराया

हिम्मत टूटने लगी

आत्मविश्वास भी डगमगाया

जब कुछ नज़र ना आया

यह वो रात थी जब चंद भी ना जाने कहाँ छुप गया

रोशनी का कोई साधन नज़र ना आया o

रास्ते खोने लगे , मार्ग भी हर्षाया

मंज़िलें ओर दूर होने लगी

तब समय भी मुस्कुराया

अपनी बेबसी में

मेरे मन में भी आया

हार हो चुकी अब

परिश्रम व्यर्थ बहाया

जब गिरना ही लिखा है किस्मत में

फिर क्यों तू ऊपर आया

हमेशा वो नहीं मिलता जो तुम चाहते हो

पर क्या कौशिश भी नहीं करोगे

बिना परीक्षा दिए

तुम पहले ही परिणाम कैसे जान जायोगे

क्या बिना जाले दीपक रोशनी दे सकता है

क्या बिना साहस के युद्ध जीता जा सकता है

हार मान लेना ही सबसे बड़ी हार है

और फिर पछताना जीवन भर का

क्यों काश का ही रह जाऐगा बस फिर ये फसाना ।

© ईरा सिंह

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निश्चय

इन हवाओं ,इन फ़िज़ाओं का रुख

इन में बहती एक आशा

इन आशाओं और निराशाओं की एक

अलग ही परिभाषा

एक अलग ही रंजिश

एक अलग ही एहसास

ये कुछ कह रही है ,कुछ तो बताना चाहती है

इन के साथ बह जाओ

कुछ अपना कुछ हमारा भला कर जाओ

मंज़िल मिलती नहीं मात्र सोच लेने से

हर संभव प्रयास

हर इशारे की समझ जरूरी

भाग्य में जो लिखा है वही होगा

ये जरूरी नहीं

क्योंकि कुछ भी हमारी सोच के परे नहीं।

©ईरा सिंह

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एक सोच ……

दुनिया में कितने गम है

मेरे गम कितने कम है

हम तुम तो बस रोते रहते

ये ऐसे क्यों हुआ

ये ऐसा क्यों है जैसे

सवालो में ही खोए रहते

छोटी -सी ज़िन्दगी

निकल गई रो- रो कर

थोड़ा तो हँस ले

थोड़ा तो जी ले

एक बार बस एक बार

तू दुनिया के परे सोच ले

फिर देख एक नया सवेरा आऐगा और

तू खुले आसमान में खो जाऐगा

उन्मुक्त गगन में जब तू पंख उड़ाऐगा

बंद पिंजरे के सारे सुख भूल जाऐगा ।

© ईरा सिंह

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लाइफ इन लॉकडाउन

किसने सोचा था एक दिन ऐसा भी आऐगा,थम सी जाऐगी कुछ ज़िंदगी

है सब अपने घर में ही बन्दी,सड़के हो गई है सुनी

रेल,हवाई जहाज सब रुक गए,मोटर-गाड़ियों का शोर हो गया कही गुम

प्रदुषण भी कही छुप गया,बाजारों की भी रौनक ख़त्म

बंद पड़े है सब दफ्तर, मॉल और कारखाने, स्कूल और कॉलेज में भी पसरी शांति

चारो और है सन्नाटा ,रेस्टोरेंट और सिनेमाघरों में भी पड़ा है ताला

और अस्पताल में है भीड़ भारी

डॉक्टर, स्वस्थ्यकर्मी , सफ़ाई कर्मचारी , पुलिस ही बने है संगी

फ़र्ज़ अपना निभाने के लिए , अपने आप को भी वो भूल गए

फिर भी प्रहार वो खा रहे

डरा सहमा बैठा हैं मनुष्य ,एक दूसरे से मिलने से भी अब है वो घबराहता

ना दिन का है पता और ना है रात को चैन

बार बार हाथ धुलने को आतुर , साफ सफ़ाई में अब हो गया वो चतुर

इतने मुखौटे पहने मानव को मास्क एक ही चाहिए

सैनिटाइजर की एक शीशी , अमृत समान मान रहा

समान एकत्रित करने की होड़ से , सब अचंभित है

खुद को पहले बचा ले , मानवता से क्या मतलब है

हमेशा छुट्टी पाने की वो चाह भी अब ना मन मे आती

उसको दफ्तर और स्कूल की याद बहुत सताती

पर वो चिड़ियों की मधुर -मधुर चहचाना ,वो समुंदर की लहरों का संगीत

वो बारिश की बूंदो का राग,फिर मन बह ला रहा

खुले नीले आसमान में इंद्र धनुष भी अपनी खुशी जता रहा

ठंडी ठंडी पवन का झोंका एहसास अलग करवा रहा

हरे -भरे झूमते पेड़ -पौधों से,मन – मोहक फूलो की खुशबू से

पर्यावरण फिर इतरा रहा ,उत्साह नया जगा रहा

शायद जो भूल गया था इंसान , याद उसको वही दिलवा रहा

क्या पता अब मनुष्य समझ पाए

वो प्रकृति से है , प्रकृति उससे नही

प्रकृति तो सबकी जननी है

सिर्फ तेरा ही उस पर हक नहीं ।

© ईरा सिंह